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भारत में न्यायालयों का पदानुक्रम: सुप्रीम कोर्ट से लोक अदालत तक

भारत की न्याय व्यवस्था एकीकृत है, जिसमें सबसे ऊपर सुप्रीम कोर्ट, उसके नीचे हाईकोर्ट और फिर जिलों की दीवानी और आपराधिक अदालतें हैं। यह लेख छत्तीसगढ़ के संदर्भ में हर स्तर, प्रमुख अधिकरणों और लोक अदालत की सही भूमिका समझाता है।
न्याय व्यवस्थापहली बार प्रकाशित अपडेट किया गया 7 मिनट
मुंबई में बॉम्बे हाई कोर्ट का भवन
फ़ोटो: Dhaval Shah / Unsplash

मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट शीर्ष पर है; 2026 से इसकी स्वीकृत संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 38 है और न्यायाधीश 65 वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।
  • देश में 25 हाईकोर्ट हैं; छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट 1 नवंबर 2000 को बिलासपुर में 19वें हाईकोर्ट के रूप में स्थापित हुआ।
  • जिले में दीवानी मामलों के लिए जिला न्यायाधीश और सिविल जज, तथा आपराधिक मामलों के लिए सत्र न्यायालय और न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं।
  • कंपनी, ऋण वसूली, GST, उपभोक्ता और दुर्घटना दावों के लिए अलग अधिकरण और आयोग हैं।
  • लोक अदालत वैकल्पिक विवाद समाधान का मंच है; इसका अवार्ड अंतिम होता है और उसके खिलाफ अपील नहीं होती।

भारत में न्यायालयों का पदानुक्रम एक पिरामिड की तरह है। सबसे ऊपर सुप्रीम कोर्ट है, उसके नीचे हर राज्य या राज्यों के समूह के लिए हाईकोर्ट, और हाईकोर्ट के नीचे जिलों की दीवानी और आपराधिक अदालतें। इनके साथ परिवार न्यायालय, विशेष अधिकरण (Tribunals) और उपभोक्ता आयोग जैसे मंच भी हैं, जो खास प्रकार के विवाद सुनते हैं।

भारत की न्याय व्यवस्था एकीकृत है: सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी है (संविधान का अनुच्छेद 141), और किसी हाईकोर्ट के फैसले उस राज्य की अधीनस्थ अदालतों को बांधते हैं। सामान्यतः मुकदमा नीचे की अदालत से शुरू होता है और अपील ऊपर की अदालत में जाती है।

लोक अदालत इस पदानुक्रम की सबसे निचली अदालत नहीं है, जैसा कई पुराने लेखों में लिखा मिलता है। यह वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution) का मंच है, जहाँ विवाद आपसी समझौते से सुलझते हैं।

न्यायालयों का पदानुक्रम एक नज़र में

भारत की न्याय व्यवस्था के मुख्य स्तर
स्तरन्यायालय या मंचमुख्य काम
राष्ट्रीयसुप्रीम कोर्ट, नई दिल्लीअंतिम अपील, संवैधानिक प्रश्न, मौलिक अधिकारों के लिए रिट, केंद्र और राज्यों के विवाद
राज्यहाईकोर्ट (छत्तीसगढ़ के लिए बिलासपुर)रिट याचिकाएं, अपील, पुनरीक्षण, अधीनस्थ अदालतों पर अधीक्षण
जिलाजिला न्यायाधीश और सत्र न्यायाधीशदीवानी अपील और मुकदमे, गंभीर अपराधों का विचारण
जिले के भीतरसिविल जज और न्यायिक मजिस्ट्रेटसामान्य दीवानी मुकदमे, अधिकांश आपराधिक मामलों का विचारण
विशेष मंचपरिवार न्यायालय, अधिकरण, उपभोक्ता आयोगवैवाहिक, कंपनी, ऋण वसूली, GST, उपभोक्ता और दुर्घटना दावे
वैकल्पिकलोक अदालतआपसी समझौते से निपटारा; अवार्ड अंतिम, अपील नहीं

सुप्रीम कोर्ट के अधिकार और क्षेत्राधिकार

सुप्रीम कोर्ट की स्थापना संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत हुई है। 2026 में इसकी स्वीकृत संख्या बढ़ाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित 38 न्यायाधीश कर दी गई। न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और वे 65 वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं। इसके मुख्य क्षेत्राधिकार ये हैं:

  • मूल क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 131): केंद्र और राज्यों के बीच, या राज्यों के आपसी विवाद।
  • रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 32): मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार: हाईकोर्ट के दीवानी, आपराधिक और संवैधानिक मामलों के फैसलों पर अपील, और अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिका (SLP)।
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 143): राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए कानूनी प्रश्नों पर राय।
  • पूर्ण न्याय की शक्ति (अनुच्छेद 142) और अपने फैसलों के पुनर्विलोकन (Review) की शक्ति।

अनुच्छेद 136 के तहत अपील अधिकार के रूप में नहीं होती; सुप्रीम कोर्ट अपने विवेक से तय करता है कि मामले में सुनवाई की अनुमति दी जाए या नहीं।

हाईकोर्ट क्या करते हैं?

देश में 25 हाईकोर्ट हैं। संविधान हर राज्य के लिए हाईकोर्ट की व्यवस्था करता है, पर कुछ हाईकोर्ट एक से अधिक राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों के लिए काम करते हैं, जैसे गुवाहाटी हाईकोर्ट। हाईकोर्ट के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।

  • रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 226): मौलिक अधिकारों के साथ अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी करना।
  • अधीक्षण (अनुच्छेद 227): राज्य की अधीनस्थ अदालतों और अधिकरणों पर निगरानी।
  • अपील और पुनरीक्षण: जिला अदालतों के दीवानी और आपराधिक फैसलों पर।
  • अंतर्निहित शक्ति: BNSS की धारा 528 के तहत FIR या आपराधिक कार्यवाही रद्द करना, और जमानत से जुड़े आदेश।

कुछ पुराने हाईकोर्ट, जैसे बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास और दिल्ली हाईकोर्ट, बड़े दीवानी मुकदमों की सीधी सुनवाई (साधारण मूल क्षेत्राधिकार) भी करते हैं।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के साथ 1 नवंबर 2000 को बिलासपुर में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की स्थापना हुई। यह देश का 19वां हाईकोर्ट है और इसका परिसर बिलासपुर के बोदरी में है। राज्य की जिला अदालतों और परिवार न्यायालयों के फैसलों पर अपीलें, पुनरीक्षण और राज्य से जुड़ी रिट याचिकाएं यहीं सुनी जाती हैं। मामलों की स्थिति (Case Status), वाद सूची और आदेश हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट highcourt.cg.gov.in (opens in a new tab) पर देखे जा सकते हैं। रिट और अपील की प्रक्रिया पर हाईकोर्ट रिट और अपील में हमारी प्रैक्टिस पृष्ठ पर जानकारी है।

जिला स्तर की दीवानी अदालतें

हर जिले में न्याय व्यवस्था का केंद्र जिला न्यायालय है। दीवानी मामलों में जिला न्यायाधीश (District Judge) सबसे ऊपर होते हैं, और उनके नीचे सिविल जज (वरिष्ठ खंड) तथा सिविल जज (कनिष्ठ खंड), जिन्हें हिंदी में व्यवहार न्यायाधीश भी कहा जाता है। संपत्ति, अनुबंध, बंटवारा, निषेधाज्ञा (Injunction) और वसूली जैसे मुकदमे मामले के मूल्य और प्रकृति के अनुसार इन्हीं अदालतों में शुरू होते हैं।

परिवार न्यायालय

परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 के तहत बने परिवार न्यायालय तलाक, भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी और संरक्षकता जैसे मामले सुनते हैं और पहले सुलह का प्रयास करते हैं। इनके फैसले पर अपील सीधे हाईकोर्ट में होती है। कस्टडी के नियम तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी वाले लेख में समझाए गए हैं।

राजस्व न्यायालय

छत्तीसगढ़ में जमीन से जुड़े नामांतरण (Mutation), सीमांकन और इसी तरह के मामले छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी (SDO) और कलेक्टर जैसे राजस्व न्यायालयों में चलते हैं। भूमि रिकॉर्ड राज्य के भुइयां पोर्टल पर प्रकाशित होते हैं।

आपराधिक अदालतों का ढांचा (BNSS धारा 6)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 6 के अनुसार हाईकोर्ट के अलावा चार प्रकार की आपराधिक अदालतें होती हैं:

  • सत्र न्यायालय (Court of Session): जिले की सबसे ऊँची आपराधिक अदालत, जो हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों का विचारण करती है और मजिस्ट्रेट के फैसलों पर अपील सुनती है।
  • प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट: अधिकांश आपराधिक मामलों का विचारण करते हैं और तीन वर्ष तक के कारावास की सजा दे सकते हैं।
  • द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट: कम गंभीर अपराधों के मामले।
  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate): जिला मजिस्ट्रेट और SDM जैसे अधिकारी, जो शांति व्यवस्था से जुड़े निवारक आदेश देते हैं, पर अपराधों का विचारण नहीं करते।

सत्र न्यायाधीश कानून द्वारा अधिकृत कोई भी सजा दे सकते हैं, पर मृत्युदंड हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही लागू होता है। किस अपराध का विचारण कौन-सी अदालत करेगी, यह BNSS की पहली अनुसूची में लिखा है। गिरफ्तारी से पहले राहत के लिए किस अदालत में जाएँ, यह अग्रिम जमानत की प्रक्रिया वाले लेख में बताया गया है।

छत्तीसगढ़ से जुड़े प्रमुख अधिकरण (Tribunals)

कई विषयों के लिए संसद ने विशेष अधिकरण बनाए हैं, जहाँ उस विषय के मामले सीधे जाते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों और व्यवसायों के लिए मुख्य मंच ये हैं:

  • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), कटक पीठ: छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कंपनी और दिवाला (Insolvency) मामले; अपील राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) में।
  • ऋण वसूली अधिकरण (DRT), जबलपुर: मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बैंकों और वित्तीय संस्थानों के ₹20 लाख या उससे अधिक के वसूली मामले, और SARFAESI कार्रवाई के विरुद्ध आवेदन।
  • GST अपीलीय अधिकरण, रायपुर पीठ: अप्रैल 2026 से नवा रायपुर में अस्थायी परिसर से कार्यरत; इसकी प्रधान पीठ नई दिल्ली में है, जिसने 16 फरवरी 2026 से सुनवाई शुरू की।
  • उपभोक्ता आयोग: जिला आयोग (₹50 लाख तक), राज्य आयोग (₹50 लाख से अधिक और ₹2 करोड़ तक) और राष्ट्रीय आयोग (₹2 करोड़ से अधिक), जहाँ सीमा चुकाई गई राशि से तय होती है।
  • मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT): सड़क दुर्घटना में मृत्यु या चोट पर मुआवजे के दावे।

लोक अदालत क्या है और इसका फैसला कितना अंतिम है?

लोक अदालत विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत आयोजित होती है। यह नियमित अदालतों की श्रृंखला का हिस्सा नहीं, बल्कि समझौते का मंच है, जहाँ अदालत में लंबित मामले और मुकदमे से पहले के (Pre-litigation) विवाद, दोनों सुलझाए जा सकते हैं।

  • लोक अदालत का अवार्ड अंतिम और बाध्यकारी होता है, उसे दीवानी अदालत की डिक्री माना जाता है, और उसके खिलाफ कोई अपील नहीं होती।
  • अदालत में लंबित मामला लोक अदालत में सुलझने पर चुकाई गई कोर्ट फीस लौटाई जाती है।
  • जिन अपराधों का कानून में शमन नहीं हो सकता, उनसे जुड़े मामले लोक अदालत में नहीं सुलझाए जा सकते।
  • बिजली, पानी और परिवहन जैसी सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं के विवादों के लिए स्थायी लोक अदालतें भी हैं।

लोक अदालतें राष्ट्रीय, राज्य और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से आयोजित होती हैं। यही प्राधिकरण पात्र व्यक्तियों को निःशुल्क कानूनी सहायता भी देते हैं।

आपका मामला किस अदालत में जाएगा?

कोई मामला किस अदालत में जाएगा, यह तीन बातों से तय होता है: विषय (दीवानी, आपराधिक, पारिवारिक या किसी अधिकरण के दायरे का मामला), स्थान (जहाँ घटना हुई, संपत्ति स्थित है या पक्षकार रहते हैं) और आर्थिक मूल्य (दीवानी और उपभोक्ता मामलों में)। अपील का सामान्य रास्ता इस प्रकार है:

  • दीवानी मुकदमा: सिविल जज, फिर जिला न्यायाधीश या हाईकोर्ट में अपील, और कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न पर आगे अपील।
  • आपराधिक मामला: मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय में विचारण, फिर सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में अपील, और अंत में सुप्रीम कोर्ट।
  • पारिवारिक मामला: परिवार न्यायालय, फिर हाईकोर्ट।
  • अधिकरण के मामले: संबंधित अपीलीय अधिकरण, फिर कानून के अनुसार हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट।

गलत मंच चुनने से समय और खर्च दोनों बढ़ते हैं, इसलिए शुरुआत में ही सही अदालत की पहचान कर लेना उपयोगी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत में कितने हाईकोर्ट हैं?

भारत में 25 हाईकोर्ट हैं, जिनमें से कुछ एक से अधिक राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों के लिए काम करते हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट 1 नवंबर 2000 को बिलासपुर में स्थापित हुआ और यह देश का 19वां हाईकोर्ट था। हाईकोर्ट के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश 65 वर्ष में।

सुप्रीम कोर्ट में कितने न्यायाधीश होते हैं?

2026 में सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत संख्या बढ़ाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित 38 कर दी गई। न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं। स्वीकृत संख्या अधिकतम सीमा है; किसी समय कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या रिक्तियों के कारण इससे कम हो सकती है।

क्या लोक अदालत के फैसले के खिलाफ अपील हो सकती है?

नहीं। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत लोक अदालत का अवार्ड अंतिम और बाध्यकारी होता है, उसे दीवानी अदालत की डिक्री माना जाता है और उसके खिलाफ अपील नहीं होती। इसलिए समझौते की शर्तें ध्यान से पढ़कर ही सहमति दें। सहमति न होने या धोखाधड़ी जैसे सीमित आधारों पर अदालतों ने हाईकोर्ट में रिट याचिका का रास्ता माना है।

सत्र न्यायालय और मजिस्ट्रेट न्यायालय में क्या अंतर है?

BNSS की धारा 6 के तहत सत्र न्यायालय जिले की सबसे ऊँची आपराधिक अदालत है, जो गंभीर अपराधों का विचारण करती है और मजिस्ट्रेट के फैसलों पर अपील सुनती है। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट कम गंभीर अपराधों का विचारण करते हैं और तीन वर्ष तक की कैद की सजा दे सकते हैं। किस अपराध का विचारण कौन करेगा, यह BNSS की पहली अनुसूची में लिखा है।

छत्तीसगढ़ के कंपनी या बैंक वसूली मामले कहाँ जाते हैं?

छत्तीसगढ़ के कंपनी और दिवाला मामलों के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की कटक पीठ है, जो छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों के लिए है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों के ₹20 लाख या उससे अधिक के वसूली मामले ऋण वसूली अधिकरण (DRT) जबलपुर में जाते हैं। GST अपीलों के लिए GST अपीलीय अधिकरण की रायपुर पीठ अप्रैल 2026 से कार्यरत है।

संदर्भित कानून और निर्णय

  • Constitution of India, Articles 32, 124, 131, 136, 141, 142, 143, 214, 217, 226 and 227
  • Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, Section 6 and First Schedule
  • Legal Services Authorities Act, 1987, Sections 19, 21 and 22B
  • Family Courts Act, 1984
  • Chhattisgarh Land Revenue Code, 1959
  • High Court of Chhattisgarh, Bilaspur
  • Supreme Court of India

यह लेख 24 सितंबर 2026 तक के कानून की सामान्य जानकारी देता है। यह कानूनी सलाह नहीं है। किसी विशेष मामले में सलाह के लिए किसी अधिवक्ता से संपर्क करें।

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