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498A (BNS 85) के आरोप लगे हैं? आपके कानूनी अधिकार और उपाय

498A (अब BNS धारा 85) का आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है, और कानून आरोपी पक्ष को गिरफ्तारी से सुरक्षा तथा बेबुनियाद FIR को चुनौती देने के अधिकार देता है। यह लेख सबूत, पुलिस नोटिस, अग्रिम जमानत, कूलिंग पीरियड, FIR रद्द कराने और समझौते के कानूनी रास्ते क्रम से समझाता है।
आपराधिक कानूनपहली बार प्रकाशित अपडेट किया गया 8 मिनट
लकड़ी की अलमारियों में रखी जिल्दबंद किताबें
फ़ोटो: Aleix Ventayol / Unsplash

मुख्य बातें

  • 498A (BNS 85) का आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है; कानून गिरफ्तारी से सुरक्षा और FIR को चुनौती देने के रास्ते देता है।
  • BNSS धारा 35 के नोटिस का पालन करते रहने पर सामान्यतः गिरफ्तारी नहीं होती।
  • गिरफ्तारी की उचित आशंका पर BNSS धारा 482 के तहत सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मांगी जा सकती है।
  • बेबुनियाद FIR या वास्तविक समझौते की स्थिति में हाईकोर्ट BNSS धारा 528 के तहत कार्यवाही रद्द कर सकता है।
  • शिकायतकर्ता या गवाहों पर दबाव डालना नया अपराध बन सकता है और जमानत रद्द करा सकता है।

यदि आप पर या आपके परिवार पर 498A (अब BNS धारा 85) के तहत आरोप लगे हैं, या ऐसी शिकायत की आशंका है, तो पहली बात यह समझिए कि आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है। कानून आपको अपना पक्ष रखने, गिरफ्तारी से सुरक्षा मांगने और बेबुनियाद FIR को हाईकोर्ट में चुनौती देने के ठोस अधिकार देता है।

यदि आपको लगता है कि मामला झूठा है या बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज कराया गया है, तब भी बचाव का सही रास्ता कानूनी प्रक्रिया से होकर जाता है। यह कानून वास्तविक पीड़ित महिलाओं की रक्षा के लिए है और अदालतें हर मामले को उसके तथ्यों पर परखती हैं, इसलिए शांत रहकर, सबूतों के साथ बचाव करना ही उपयोगी है। शिकायतकर्ता या गवाहों पर किसी भी तरह का दबाव आपकी स्थिति को कमजोर ही करता है।

सबूत और दस्तावेज़ कानूनी तरीके से कैसे सहेजें?

बचाव की तैयारी तथ्यों से शुरू होती है। शादी से अब तक की मुख्य घटनाओं की तारीखवार सूची बनाइए और उनसे जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखिए:

  • पति-पत्नी या दोनों परिवारों के बीच हुए संदेश, ईमेल और पत्र, जो आपके अपने फोन या खाते में हैं।
  • विवाह, उपहारों की सूची, बैंक लेन-देन और घर-खर्च से जुड़े कागज़।
  • यदि पत्नी ने स्वयं घर छोड़ा, तो उस समय के संदेश या अन्य रिकॉर्ड।
  • पहले की किसी शिकायत, पुलिस परामर्श या लिखित समझौते के कागज़।
  • परिवार के जो सदस्य अलग शहर में रहते हैं, उनके निवास और नौकरी के दस्तावेज़।

रिकॉर्ड को मूल फोन या डिवाइस में बिना बदलाव के रखें और अलग बैकअप बनाएं; कुछ भी संपादित या डिलीट न करें। अदालत में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पेश करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 (पहले साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B) में प्रमाणपत्र की व्यवस्था है, इसलिए मूल डेटा की विश्वसनीयता मायने रखती है। किसी दूसरे व्यक्ति के फोन, ईमेल या सोशल मीडिया खाते में बिना अनुमति प्रवेश करना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत अपराध हो सकता है, इसलिए सबूत केवल कानूनी तरीके से जुटाएं।

पुलिस का नोटिस आए तो क्या करें?

सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस अक्सर गिरफ्तारी के बजाय BNSS की धारा 35 (पहले CrPC की धारा 41A) के तहत उपस्थिति का नोटिस देती है। यह नोटिस आपके लिए अपना पक्ष रखने का अवसर है:

  • तय तारीख और समय पर थाने में उपस्थित हों। किसी वैध कारण से न जा सकें तो लिखित में सूचना देकर नई तारीख मांगें।
  • नोटिस, अपनी उपस्थिति और दिए गए दस्तावेज़ों की पावती संभालकर रखें।
  • पूछताछ में शांति से और सच्चाई के साथ उत्तर दें, और अपने पक्ष के दस्तावेज़ों की प्रतियां दें।

धारा 35 के अनुसार, जो व्यक्ति नोटिस का पालन करता रहता है, उसे उस अपराध में तब तक गिरफ्तार नहीं किया जाता जब तक पुलिस अधिकारी लिखित कारणों से गिरफ्तारी को आवश्यक न माने। नोटिस की अनदेखी करने पर गिरफ्तारी का आधार बन जाता है। अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं सुरक्षा उपायों को अनिवार्य बताया था।

अग्रिम जमानत (BNSS धारा 482) कब और कहाँ मांगें?

यदि गिरफ्तारी की उचित आशंका है, तो BNSS की धारा 482 (पहले CrPC की धारा 438) के तहत सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) का आवेदन किया जा सकता है। FIR दर्ज होना अनिवार्य नहीं है, पर आशंका ठोस तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, जैसे लिखित शिकायत या पुलिस की कार्रवाई। शिकायत में जिन परिजनों के नाम हैं, वे अपनी परिस्थिति के अनुसार आवेदन कर सकते हैं।

अदालत आमतौर पर जांच में सहयोग करने, गवाहों को प्रभावित न करने और बिना अनुमति देश न छोड़ने जैसी शर्तें लगाती है। सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2020) के अनुसार यह सुरक्षा सामान्यतः किसी तय अवधि तक सीमित नहीं होती। प्रक्रिया, दस्तावेज़ और शर्तें अग्रिम जमानत कैसे लें लेख में विस्तार से दी गई हैं।

कूलिंग पीरियड और परिवार कल्याण समिति में क्या होता है?

22 जुलाई 2025 को शिवांगी बंसल बनाम साहिब बंसल (2025 INSC 883) में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2022 के दिशानिर्देशों का समर्थन किया। इनके अनुसार FIR या शिकायत के बाद दो महीने तक नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, और मामला जिले की परिवार कल्याण समिति (Family Welfare Committee) को भेजा जाता है। जिन मामलों में चोट हो, या दस वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराध जुड़े हों, वे इस व्यवस्था से बाहर हैं।

समिति दोनों पक्षों को बुलाकर बात करती है, समझौते की संभावना देखती है और अपनी रिपोर्ट पुलिस या मजिस्ट्रेट को भेजती है। इस अवधि को तैयारी और सम्मानजनक बातचीत का समय मानें, और समिति के सामने अपनी बात तथ्यपूर्ण और संयमित रखें। ध्यान रहे, पुराने लेखों में जिन समितियों का जिक्र मिलता है वे 2017 के एक फैसले से बनी थीं, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ ने बदल दिया था; आज की व्यवस्था जुलाई 2025 के फैसले पर आधारित है।

हाईकोर्ट से FIR रद्द (Quashing) कैसे कराई जाती है?

हाईकोर्ट को BNSS की धारा 528 (पहले CrPC की धारा 482) के तहत अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) प्राप्त है, जिसका उपयोग वह अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या न्याय सुनिश्चित करने के लिए करता है। हरियाणा राज्य बनाम भजनलाल (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी स्थितियों के उदाहरण दिए जिनमें FIR रद्द की जा सकती है, जैसे:

  • FIR के आरोप पूरे के पूरे सच मान लिए जाएँ, तब भी कोई अपराध नहीं बनता।
  • आरोप इतने असंभव या बेतुके हैं कि कोई समझदार व्यक्ति उन्हें कार्यवाही का पर्याप्त आधार नहीं मान सकता।
  • कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावना से, निजी बदला लेने के इरादे से शुरू की गई है।

498A के मामलों में अदालतों ने कई बार उन रिश्तेदारों के विरुद्ध कार्यवाही रद्द की है जिन पर केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप थे। पर इस चरण पर हाईकोर्ट सबूतों की विस्तृत जांच नहीं करता; यदि आरोपों की सच्चाई ट्रायल में ही तय हो सकती है, तो याचिका खारिज भी हो सकती है। छत्तीसगढ़ में यह याचिका बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट में दायर होती है।

समझौता होने पर मामला कैसे समाप्त होता है?

BNS धारा 85 का अपराध ऐसा नहीं है जिसका शमन पक्षकार आपस में कर सकें, इसलिए वास्तविक समझौते के बाद भी मामला अपने आप खत्म नहीं होता। बी.एस. जोशी बनाम हरियाणा राज्य (2003) में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे वैवाहिक विवादों में वास्तविक समझौते के आधार पर हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्ति से कार्यवाही रद्द कर सकता है। ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012) में इस शक्ति की सीमा स्पष्ट हुई: मुख्यतः निजी प्रकृति के विवाद, जैसे वैवाहिक और पारिवारिक विवाद, इसके दायरे में आते हैं, जबकि हत्या, बलात्कार या डकैती जैसे गंभीर अपराध नहीं।

समझौता स्वैच्छिक और लिखित होना चाहिए। इसमें प्रायः भरण-पोषण या एकमुश्त राशि, स्त्रीधन की वापसी, बच्चों की कस्टडी और दोनों ओर के लंबित मामलों की वापसी जैसे बिंदु तय होते हैं, और कई बार हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक भी लिया जाता है।

मध्यस्थता और दांपत्य अधिकारों की याचिका

कई वैवाहिक विवाद अदालतों से जुड़े मध्यस्थता केंद्रों में सुलझते हैं, और परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 के तहत परिवार न्यायालय पर भी पहले सुलह का प्रयास करने का दायित्व है। मध्यस्थता की बातचीत गोपनीय रहती है, और जो समझौता होता है उसे अदालत में दर्ज कराकर लागू किया जाता है।

यदि पत्नी बिना उचित कारण के अलग रह रही है और आप वास्तव में वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करना चाहते हैं, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) की याचिका परिवार न्यायालय में दी जा सकती है। अलग रहने का उचित कारण साबित करने का भार उस पक्ष पर होता है जो अलग हुआ है। अदालत याचिका की सद्भावना भी देखती है, इसलिए इसे केवल जवाबी कदम के रूप में इस्तेमाल करना उपयोगी नहीं होता।

झूठी शिकायत पर कानून में क्या उपाय हैं?

यदि यह स्थापित हो जाए कि शिकायत जानबूझकर झूठी थी, तो कानून में कुछ उपाय हैं। इनका प्रयोग सावधानी से, और आम तौर पर मुख्य मामले का निर्णय होने के बाद, किया जाता है:

  • BNS धारा 217 (पहले IPC 182): किसी लोक सेवक को इस इरादे से झूठी सूचना देना कि वह दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करे।
  • BNS धारा 248 (पहले IPC 211): यह जानते हुए कि कोई न्यायोचित या वैध आधार नहीं है, किसी को नुकसान पहुँचाने के इरादे से उस पर झूठा आपराधिक आरोप लगाना या कार्यवाही शुरू करना।
  • दुर्भावनापूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) के लिए हर्जाने का दीवानी मुकदमा।

केवल बरी हो जाना, या गवाहों का बयान से मुकर जाना, अपने आप यह साबित नहीं करता कि शिकायत झूठी थी। इन अपराधों पर कार्यवाही के लिए सामान्यतः संबंधित लोक सेवक या अदालत की लिखित शिकायत जैसी कानूनी शर्तें भी पूरी करनी होती हैं। बदले की भावना से दर्ज कराई गई जवाबी FIR कई बार बचाव को ही कमजोर कर देती है।

किन गलतियों से बचें?

  • शिकायतकर्ता, उसके परिवार या गवाहों को धमकाना, दबाव डालना या कोई प्रलोभन देना। यह नया अपराध बन सकता है और जमानत रद्द होने का कारण भी।
  • सोशल मीडिया पर मामले, शिकायतकर्ता या उसके परिवार के बारे में कुछ भी पोस्ट करना।
  • पुलिस के नोटिस या अदालत के समन की अनदेखी करना।
  • सबूत गढ़ना, बदलना या मिटाना।
  • अंतरिम भरण-पोषण या अदालत के अन्य आदेशों का पालन टालना।

याद रखें कि शिकायतकर्ता के भी भरण-पोषण, संरक्षण आदेश और स्त्रीधन वापसी जैसे कानूनी अधिकार हैं, जिनका विवरण धारा 498A (BNS 85) के कानून वाले लेख में है। ऐसे मामलों में अदालती प्रक्रिया कैसे चलती है, इसकी जानकारी आपराधिक मामलों में हमारी प्रैक्टिस पृष्ठ पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या 498A का केस समझौते से वापस लिया जा सकता है?

BNS धारा 85 का अपराध ऐसा नहीं है जिसका शमन पक्षकार स्वयं कर सकें, इसलिए केवल शिकायतकर्ता के कहने से मामला खत्म नहीं होता। वास्तविक और स्वैच्छिक समझौता होने पर दोनों पक्ष BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट से कार्यवाही रद्द करने का अनुरोध कर सकते हैं। बी.एस. जोशी (2003) और ज्ञान सिंह (2012) के फैसलों में हाईकोर्ट की इस शक्ति को मान्यता मिली है।

498A में अग्रिम जमानत किस अदालत से मिलती है?

BNSS की धारा 482 के तहत सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट, दोनों अग्रिम जमानत दे सकते हैं। व्यवहार में आम तौर पर पहले उस जिले के सत्र न्यायालय में आवेदन किया जाता है जहाँ मामला दर्ज है। वहाँ से आवेदन खारिज होने पर हाईकोर्ट में नया आवेदन किया जा सकता है, और छत्तीसगढ़ के मामलों में हाईकोर्ट बिलासपुर में है।

झूठे 498A केस से कैसे बचें?

सबसे पहले तथ्यों और दस्तावेज़ों को कानूनी तरीके से सुरक्षित करें, पुलिस के नोटिस का पालन करें और जरूरत हो तो अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करें। यदि FIR में लिखी बातें सच मानने पर भी अपराध नहीं बनता, तो हाईकोर्ट में धारा 528 के तहत FIR रद्द करने की याचिका दी जा सकती है। शिकायतकर्ता पर किसी तरह का दबाव न डालें।

क्या कूलिंग पीरियड में पुलिस गिरफ्तार कर सकती है?

शिवांगी बंसल (जुलाई 2025) के फैसले के बाद FIR या शिकायत के दो महीने तक नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, और मामला परिवार कल्याण समिति को भेजा जाता है। पर जिन मामलों में चोट है, या दस वर्ष या उससे अधिक सजा वाली धाराएँ जुड़ी हैं, उनमें यह सुरक्षा लागू नहीं होती।

बरी होने के बाद क्या झूठी शिकायत पर केस कर सकते हैं?

केवल बरी होना यह साबित नहीं करता कि शिकायत जानबूझकर झूठी थी। ठोस आधार हों, तो BNS धारा 217 या 248 (पहले IPC 182 और 211) के तहत कार्यवाही, या दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए हर्जाने का दीवानी मुकदमा संभव है। इन उपायों की कई कानूनी शर्तें हैं, इसलिए निर्णय के बाद तथ्यों का आकलन करके ही आगे बढ़ें।

संदर्भित कानून और निर्णय

  • Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, Sections 35, 482 and 528
  • Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023, Sections 85, 217 and 248
  • Hindu Marriage Act, 1955, Sections 9 and 13B
  • Arnesh Kumar v. State of Bihar (Supreme Court, 2014)
  • State of Haryana v. Bhajan Lal (Supreme Court, 1992)
  • B.S. Joshi v. State of Haryana (Supreme Court, 2003)
  • Gian Singh v. State of Punjab (Supreme Court, 2012)
  • Shivangi Bansal v. Sahib Bansal, 2025 INSC 883 (Supreme Court, 22 July 2025)

यह लेख 24 सितंबर 2026 तक के कानून की सामान्य जानकारी देता है। यह कानूनी सलाह नहीं है। किसी विशेष मामले में सलाह के लिए किसी अधिवक्ता से संपर्क करें।

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