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तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी: भारत में माता-पिता के अधिकार

भारत में बच्चे की कस्टडी अपने आप माँ या पिता को नहीं मिलती; अदालत बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि मानकर निर्णय लेती है। यह लेख कस्टडी के प्रकार, लागू कानून, बच्चे की पसंद, भरण-पोषण और परिवार न्यायालय की प्रक्रिया सरल भाषा में समझाता है।
पारिवारिक कानूनपहली बार प्रकाशित अपडेट किया गया 7 मिनट
सड़क पर हाथ पकड़कर चलते पिता और छोटा बच्चा
फ़ोटो: Ben White / Unsplash

मुख्य बातें

  • कस्टडी का फैसला बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि मानकर होता है; माँ या पिता का कोई स्वतः अधिकार नहीं है।
  • पाँच वर्ष से कम आयु के हिंदू बच्चे की कस्टडी सामान्यतः माँ के पास रहती है, पर यह भी बच्चे के कल्याण के अधीन है।
  • बच्चे की पसंद के लिए कानून में कोई तय उम्र नहीं है; समझदारी से पसंद बता सकने वाले बच्चे की इच्छा पर अदालत विचार कर सकती है।
  • कामकाजी माँ या गृहिणी, दोनों को कस्टडी मिल सकती है; आय कम होने पर दूसरे माता-पिता से भरण-पोषण दिलाया जा सकता है।
  • परिस्थितियाँ बदलने पर कस्टडी और मिलने के आदेश बदले जा सकते हैं।

तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी किसको मिलेगी, इसका ऐसा कोई नियम नहीं है कि वह हमेशा माँ को या हमेशा पिता को मिलेगी। भारतीय कानून में अदालत का एक ही सबसे बड़ा आधार है: बच्चे का कल्याण (Welfare of the Child)। अदालत देखती है कि बच्चे की भावनात्मक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य और सामाजिक जरूरतें किसके साथ बेहतर पूरी होंगी।

माता-पिता के बीच विवाद कितना भी गहरा हो, बच्चे के लिए दोनों महत्वपूर्ण रहते हैं। इसलिए जिस माता-पिता को कस्टडी नहीं मिलती, उसे सामान्यतः बच्चे से मिलने का अधिकार (Visitation) दिया जाता है, और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी बनी रहती है।

अदालत कस्टडी का फैसला किस आधार पर करती है?

अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act) की धारा 17 कहती है कि अदालत बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखकर निर्णय लेगी। इसके लिए अदालत बच्चे की आयु, लिंग और धर्म, प्रस्तावित अभिभावक का चरित्र और क्षमता, निकट संबंध और बच्चे के साथ मौजूदा संबंध जैसे बिंदु देखती है। हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13 भी साफ कहती है कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि (Paramount) है। व्यवहार में अदालतें ये बातें भी देखती हैं:

  • अब तक बच्चे की मुख्य देखभाल किसने की है।
  • बच्चे की पढ़ाई, स्कूल और दोस्तों से जुड़ी निरंतरता।
  • घर का माहौल, सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें।
  • क्या कोई माता-पिता बच्चे को दूसरे से दूर करने की कोशिश कर रहा है।
  • हिंसा, नशे या उपेक्षा का कोई इतिहास।

माता-पिता की आय अपने आप में निर्णायक नहीं होती। अधिक कमाने वाले माता-पिता को केवल इसी कारण कस्टडी नहीं मिलती।

कस्टडी के प्रकार और मिलने का अधिकार

बच्चे की कस्टडी के मुख्य प्रकार
प्रकारअर्थ
फिजिकल कस्टडी (Physical Custody)बच्चा किस माता-पिता के साथ रहेगा और रोजमर्रा की देखभाल कौन करेगा।
कानूनी कस्टडी (Legal Custody)पढ़ाई, इलाज और धर्म जैसे बड़े निर्णय लेने का अधिकार, जो अक्सर दोनों माता-पिता के पास रहता है।
संयुक्त कस्टडी (Joint Custody)बच्चा बारी-बारी से दोनों के साथ समय बिताता है और दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाते हैं।
एकल कस्टडी (Sole Custody)केवल एक माता-पिता को कस्टडी, सामान्यतः तब जब दूसरा बच्चे के हित में उपयुक्त न हो।
तीसरे पक्ष की कस्टडी (Third Party Custody)असाधारण स्थिति में दादा-दादी, नाना-नानी या किसी अन्य संबंधी को कस्टडी।

कानून में ‘संयुक्त कस्टडी’ की अलग परिभाषा नहीं है, पर अदालतें बच्चे के हित में साझा पालन-पोषण (Shared Parenting) की व्यवस्था करती हैं। जिस माता-पिता के पास कस्टडी नहीं होती, उसे मिलने का अधिकार (Visitation या Access) दिया जाता है, जैसे सप्ताहांत, छुट्टियों या त्योहारों का समय, या वीडियो कॉल। मिलने के आदेश का पालन न हो, तो उसे लागू कराने या बदलवाने के लिए अदालत में आवेदन किया जा सकता है।

बच्चे की कस्टडी पर कौन-से कानून लागू होते हैं?

अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 सभी धर्मों के लोगों पर लागू होने वाला सामान्य कानून है। इसके साथ हर समुदाय के व्यक्तिगत कानून भी हैं, पर सभी में बच्चे का कल्याण ही केंद्र में रहता है।

हिंदू कानून

  • हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6(a): अवयस्क लड़के या अविवाहित लड़की के प्राकृतिक अभिभावक पिता हैं, और उनके बाद माँ; पर पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः माँ के पास रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक (1999) में ‘उनके बाद’ का अर्थ ‘उनकी अनुपस्थिति में’ भी बताया, इसलिए पिता के अनुपस्थित या उदासीन रहने पर माँ भी प्राकृतिक अभिभावक के रूप में काम कर सकती है।
  • धारा 13: अभिभावक की नियुक्ति या घोषणा में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 26: तलाक या अन्य वैवाहिक मुकदमे के दौरान और डिक्री में भी अदालत बच्चों की कस्टडी, भरण-पोषण और शिक्षा के आदेश दे सकती है, जहाँ तक संभव हो बच्चों की इच्छा के अनुरूप, और बाद में इन्हें बदल भी सकती है।

अन्य समुदाय

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954: इस कानून के तहत हुए विवाहों में भी अदालत वैवाहिक मुकदमे के दौरान और बाद में बच्चों की कस्टडी, भरण-पोषण और शिक्षा के आदेश दे सकती है।
  • तलाक अधिनियम, 1869 (Divorce Act): ईसाई दंपतियों के मामलों में अदालत को कस्टडी से जुड़े आदेश देने का अधिकार है।
  • मुस्लिम कानून: माँ को छोटे बच्चों की हिज़ानत (Hizanat), यानी देखभाल और पालन-पोषण का प्राथमिक अधिकार है, जिसकी अवधि अलग-अलग विचारधाराओं में अलग है। पिता सामान्यतः बच्चे के अभिभावक बने रहते हैं, और यह अधिकार भी हमेशा बच्चे के कल्याण के अधीन है।

क्या बच्चे की अपनी पसंद मायने रखती है?

हाँ, पर इसके लिए कोई तय उम्र नहीं है। कई पुराने लेखों में नौ वर्ष जैसी निश्चित उम्र लिखी मिलती है, पर कानून ऐसा नहीं कहता। अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 17(3) के अनुसार, यदि बच्चा समझदारी से अपनी पसंद बनाने लायक है, तो अदालत उसकी पसंद पर विचार कर सकती है।

न्यायाधीश अक्सर बच्चे से अलग से, अपने कक्ष (Chamber) में सहज माहौल में बात करते हैं, ताकि वह बिना दबाव के अपनी बात कह सके। अदालत यह भी देखती है कि बच्चे की पसंद किसी के सिखाने या दबाव का परिणाम तो नहीं। अंतिम निर्णय फिर भी बच्चे के कल्याण के आधार पर होता है।

क्या कामकाजी माँ या गृहिणी को कस्टडी मिल सकती है?

हाँ। माँ का नौकरी करना अपने आप में कस्टडी न देने का कारण नहीं है। अदालत देखती है कि काम के साथ बच्चे की देखभाल की व्यवस्था, जैसे परिवार का सहयोग या स्कूल के बाद की देखरेख, कितनी भरोसेमंद है। यही कसौटी कामकाजी पिता पर भी लागू होती है।

इसी तरह, गृहिणी माँ की अपनी आय न होना भी कस्टडी में बाधा नहीं है। ऐसी स्थिति में अदालत कस्टडी माँ को देकर पिता को बच्चे के भरण-पोषण का खर्च देने का आदेश दे सकती है। अदालत के लिए महत्वपूर्ण यह है कि बच्चे को सुरक्षित, स्थिर और स्नेहपूर्ण वातावरण मिले।

बच्चे का भरण-पोषण (Child Support) कौन देगा?

कस्टडी किसी के भी पास हो, बच्चे के पालन-पोषण की आर्थिक जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की रहती है। व्यवहार में जिस माता-पिता के पास कस्टडी नहीं है, उसे प्रायः नियमित राशि देने का आदेश दिया जाता है। इसके कानूनी रास्ते हैं:

  • BNSS की धारा 144 (पहले CrPC की धारा 125) के तहत बच्चे के लिए मासिक भरण-पोषण।
  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 के तहत वैवाहिक मुकदमे में बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा का आदेश।
  • हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20, जिसके तहत माता-पिता पर बच्चों के भरण-पोषण का दायित्व है।

राशि तय करते समय अदालत माता-पिता की आय, बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य और रहन-सहन के स्तर को देखती है। भरण-पोषण और मिलने के अधिकार को अदालतें सामान्यतः अलग-अलग विषय मानती हैं, इसलिए भुगतान न होने पर उसकी वसूली के लिए अलग कानूनी उपाय अपनाए जाते हैं।

कस्टडी का आदेश कब बदला जा सकता है?

कस्टडी के आदेश को अंतिम नहीं माना जाता, क्योंकि बच्चे की जरूरतें उम्र के साथ बदलती हैं। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 अदालत को ऐसे आदेश बदलने, निलंबित करने या रद्द करने की शक्ति देती है, और अभिभावक कानून के तहत भी परिस्थिति बदलने पर नया आवेदन हो सकता है। उदाहरण के लिए:

  • कस्टडी वाले माता-पिता का दूसरे शहर या देश जाना।
  • बच्चे की पढ़ाई या स्वास्थ्य से जुड़ी नई जरूरतें।
  • मिलने के आदेश का लगातार उल्लंघन।
  • घर के माहौल में ऐसा बदलाव जो बच्चे के हित में न हो।

बच्चे को अवैध रूप से ले जाने या रोककर रखने के गंभीर मामलों में हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका भी दायर की जा सकती है। वहाँ भी अदालत का केंद्र बच्चे का कल्याण ही रहता है।

परिवार न्यायालय में कस्टडी की प्रक्रिया

कस्टडी का प्रश्न या तो तलाक के मुकदमे के भीतर उठाया जाता है, या अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम के तहत अलग याचिका से। याचिका वहाँ दायर होती है जहाँ बच्चा सामान्यतः रहता है, और जहाँ परिवार न्यायालय स्थापित है वहाँ यही मामले सुनता है। प्रक्रिया सामान्यतः इस तरह चलती है:

  1. याचिका दायर करना, जिसमें बच्चे की वर्तमान स्थिति, उसकी जरूरतें और कस्टडी मांगने के कारण बताए जाते हैं।
  2. दूसरे पक्ष को नोटिस और उसका जवाब।
  3. जरूरत होने पर अंतरिम कस्टडी या मिलने के अधिकार पर अस्थायी आदेश।
  4. काउंसलिंग और मध्यस्थता, क्योंकि परिवार न्यायालय को पहले सुलह का प्रयास करना होता है।
  5. न्यायाधीश की बच्चे से बातचीत, और जरूरत हो तो काउंसलर या कल्याण विशेषज्ञ की सहायता।
  6. साक्ष्य, जैसे स्कूल रिकॉर्ड, मेडिकल कागज़, आय के दस्तावेज़ और गवाह।
  7. अंतिम आदेश, जिसमें कस्टडी, मिलने का कार्यक्रम और भरण-पोषण तय होता है; इस पर अपील हाईकोर्ट में होती है।

आपसी सहमति से तलाक में माता-पिता स्वयं भी कस्टडी और मिलने की व्यवस्था तय कर सकते हैं, जिसे अदालत बच्चे के हित में उचित पाए तो स्वीकार करती है। अदालतों के ढांचे के लिए भारत में न्यायालयों का पदानुक्रम देखें; पारिवारिक विवादों में हमारा काम किस तरह का है, यह तलाक और पारिवारिक कानून की प्रैक्टिस पृष्ठ पर बताया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी किसको मिलती है?

भारत में कस्टडी अपने आप माँ या पिता को नहीं मिलती। अदालत हर मामले में बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि मानकर तय करती है कि बच्चा किसके साथ रहेगा। पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः माँ के पास रहती है (हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम की धारा 6(a)), पर यह भी कल्याण के अधीन है। दूसरे माता-पिता को आमतौर पर मिलने का अधिकार दिया जाता है।

बच्चा किस उम्र में अपनी पसंद बता सकता है?

कानून में कोई तय उम्र नहीं है। अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 17 के अनुसार, यदि बच्चा समझदारी से अपनी पसंद बनाने लायक है, तो अदालत उसकी पसंद पर विचार कर सकती है। न्यायाधीश अक्सर बच्चे से अलग से, सहज माहौल में बात करते हैं। बच्चे की पसंद महत्वपूर्ण है, पर अंतिम निर्णय उसके कल्याण के आधार पर होता है।

क्या पिता को बेटी की कस्टडी मिल सकती है?

हाँ। बेटे या बेटी के लिए ऐसा कोई तय नियम नहीं है कि कस्टडी पिता या माँ को ही मिलेगी। अदालत देखती है कि बच्चे की भावनात्मक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें कौन बेहतर पूरी कर सकता है। पिता उपयुक्त और देखभाल में सक्षम हों तो बेटी की कस्टडी उन्हें भी मिल सकती है, और माँ को मिलने का अधिकार दिया जाता है।

कस्टडी न मिलने पर क्या बच्चे से मिल सकते हैं?

हाँ। जिस माता-पिता को कस्टडी नहीं मिलती, उसे सामान्यतः मिलने का अधिकार (Visitation) दिया जाता है, जैसे सप्ताहांत, छुट्टियों का समय या वीडियो कॉल। बच्चे का दोनों माता-पिता से संबंध बना रहना उसके हित में माना जाता है। आदेश का पालन न होने पर अदालत से उसे लागू कराने या बदलवाने का आवेदन किया जा सकता है।

क्या कस्टडी का आदेश बाद में बदल सकता है?

हाँ। कस्टडी के आदेश अंतिम नहीं माने जाते। यदि परिस्थितियाँ बदलती हैं, जैसे माता-पिता का दूसरे शहर जाना, बच्चे की पढ़ाई या स्वास्थ्य की नई जरूरत, या आदेश का लगातार उल्लंघन, तो कोई भी पक्ष अदालत से आदेश बदलने का अनुरोध कर सकता है। अदालत फिर से बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है।

संदर्भित कानून और निर्णय

  • Guardians and Wards Act, 1890, Sections 7, 9, 17 and 25
  • Hindu Minority and Guardianship Act, 1956, Sections 6 and 13
  • Hindu Marriage Act, 1955, Section 26
  • Special Marriage Act, 1954
  • Divorce Act, 1869
  • Family Courts Act, 1984
  • Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, Section 144
  • Githa Hariharan v. Reserve Bank of India (Supreme Court, 1999)

यह लेख 24 सितंबर 2026 तक के कानून की सामान्य जानकारी देता है। यह कानूनी सलाह नहीं है। किसी विशेष मामले में सलाह के लिए किसी अधिवक्ता से संपर्क करें।

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