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धारा 498A (अब BNS धारा 85): दहेज प्रताड़ना और क्रूरता का कानून

IPC की धारा 498A अब BNS की धारा 85 है, जो विवाहित महिला को पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता से सुरक्षा देती है। यह लेख अपराध की परिभाषा, सजा, दहेज से जुड़े कानून, गिरफ्तारी के सुरक्षा उपाय और दोनों पक्षों के अधिकार सरल भाषा में समझाता है।
पारिवारिक एवं आपराधिक कानूनपहली बार प्रकाशित अपडेट किया गया 8 मिनट
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फ़ोटो: Zayed Ahmed Zadu / Unsplash

मुख्य बातें

  • IPC की धारा 498A अब BNS की धारा 85 है; 1 जुलाई 2024 से पहले की घटनाओं पर पुरानी धारा ही लागू होती है।
  • पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता पर तीन वर्ष तक की कैद और जुर्माना हो सकता है; क्रूरता की परिभाषा BNS धारा 86 में है।
  • विवाह के सात वर्ष के भीतर दहेज से जुड़ी संदिग्ध मृत्यु पर BNS धारा 80 (दहेज मृत्यु) लागू होती है।
  • गिरफ्तारी स्वतः नहीं होती; पुलिस को BNSS धारा 35 और अर्नेश कुमार (2014) के निर्देशों का पालन करना होता है।
  • जुलाई 2025 के फैसले के अनुसार FIR के बाद दो महीने तक गिरफ्तारी नहीं होती और मामला परिवार कल्याण समिति को जाता है, कुछ अपवादों को छोड़कर।
  • पीड़ित महिला घरेलू हिंसा कानून के तहत संरक्षण, निवास और भरण-पोषण के आदेश भी मांग सकती है।

धारा 498A क्या है, यह सवाल अक्सर तब उठता है जब किसी परिवार का वैवाहिक विवाद थाने या अदालत तक पहुँच जाता है। सीधा उत्तर यह है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A विवाहित महिला को उसके पति या पति के रिश्तेदारों की क्रूरता से बचाने वाला प्रावधान थी। 1 जुलाई 2024 से IPC की जगह भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) लागू है, और अब यही अपराध BNS (बीएनएस) की धारा 85 में है, जबकि ‘क्रूरता’ की परिभाषा धारा 86 में दी गई है।

इस अपराध में तीन वर्ष तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। दहेज के लिए सताना इसका सबसे जाना-पहचाना रूप है, इसलिए आम बोलचाल में इसे दहेज प्रताड़ना कानून कहा जाता है। पर यह धारा केवल दहेज तक सीमित नहीं है; ऐसा गंभीर मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न भी इसमें आता है जो महिला के जीवन या स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाए।

1 जुलाई 2024 से पहले की घटनाओं पर IPC की धारा 498A ही लागू होती है, और उस दिन लंबित कार्यवाही पुरानी CrPC के अनुसार चलती है (BNSS धारा 531)। यह कानून वास्तविक पीड़ित महिलाओं की रक्षा करता है, और अदालतों ने इसके दुरुपयोग से बचाव के उपाय भी तय किए हैं।

धारा 498A (अब BNS धारा 85) के तहत अपराध क्या है?

BNS की धारा 85 के अनुसार, जो व्यक्ति किसी महिला का पति या पति का रिश्तेदार होते हुए उस महिला के साथ क्रूरता करता है, उसे तीन वर्ष तक की कैद हो सकती है और वह जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा। प्रावधान की भाषा लगभग वही है जो धारा 498A की थी, इसलिए इस विषय पर अदालतों के पुराने फैसले आज भी मार्गदर्शन देते हैं।

इस धारा में आरोपी केवल पति या उसके रिश्तेदार हो सकते हैं, जैसे सास, ससुर, देवर या ननद। अदालतों ने ‘रिश्तेदार’ को सामान्यतः खून, विवाह या गोद लेने से बने संबंध के अर्थ में समझा है।

क्रूरता किसे माना जाता है? (BNS धारा 86)

BNS की धारा 86 क्रूरता के दो रूप बताती है:

  • जानबूझकर किया गया ऐसा आचरण जो महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकता हो, या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (मानसिक या शारीरिक) को गंभीर चोट या खतरा पहुँचा सकता हो।
  • ऐसा उत्पीड़न जिसका उद्देश्य महिला या उसके किसी संबंधी को किसी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध मांग पूरी करने के लिए मजबूर करना हो, या जो ऐसी मांग पूरी न होने के कारण किया जाए।

पहले रूप में दहेज की मांग होना जरूरी नहीं है। दूसरी ओर, वैवाहिक जीवन की सामान्य नोकझोंक को अदालतें क्रूरता नहीं मानतीं; देखा जाता है कि आचरण कितना गंभीर और जानबूझकर था।

सजा और अपराध का वर्गीकरण

BNS धारा 85 संज्ञेय (Cognizable) अपराध है, यानी पुलिस FIR दर्ज करके जांच कर सकती है, बशर्ते सूचना पीड़ित महिला ने या उसके खून, विवाह या गोद लेने से बने किसी संबंधी ने दी हो। यह गैर-जमानती (Non-bailable) अपराध है और इसका विचारण प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट करते हैं।

गैर-जमानती का अर्थ यह नहीं कि जमानत मिल ही नहीं सकती; जमानत अधिकार के रूप में नहीं, अदालत के विवेक से मिलती है। पक्षकार आपस में इस अपराध का शमन (Compounding) नहीं कर सकते, इसलिए समझौता होने पर कार्यवाही समाप्त कराने के लिए सामान्यतः हाईकोर्ट जाना पड़ता है।

दहेज और क्रूरता से जुड़े प्रमुख अपराध
अपराधप्रावधानसजा
पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरताBNS धारा 85 (पहले IPC 498A)तीन वर्ष तक की कैद और जुर्माना
दहेज मृत्युBNS धारा 80 (पहले IPC 304B)कम से कम सात वर्ष की कैद, जो आजीवन कारावास तक हो सकती है
दहेज देना या लेनादहेज प्रतिषेध अधिनियम, धारा 3कम से कम पाँच वर्ष की कैद और जुर्माना
दहेज की मांग करनादहेज प्रतिषेध अधिनियम, धारा 4छह महीने से दो वर्ष तक की कैद और जुर्माना

दहेज मृत्यु और दहेज प्रताड़ना से जुड़े अन्य कानून

दहेज मृत्यु (BNS धारा 80)

यदि विवाह के सात वर्ष के भीतर किसी महिला की मृत्यु जलने या शारीरिक चोट से होती है, या सामान्य परिस्थितियों से अलग ढंग से होती है, और यह दिखाया जाता है कि मृत्यु से कुछ समय पहले पति या उसके किसी रिश्तेदार ने दहेज की मांग को लेकर उसके साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया था, तो इसे ‘दहेज मृत्यु’ कहा जाता है। ऐसे मामले में कानून मानता है कि पति या वह रिश्तेदार उसकी मृत्यु का कारण बना।

आवश्यक तथ्य साबित होने पर अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के तहत दहेज मृत्यु का अनुमान (Presumption) लगा सकती है, जिसे गलत साबित करने का भार आरोपी पर होता है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961

इस कानून में ‘दहेज’ वह संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति है जो विवाह के संबंध में, विवाह से पहले, विवाह के समय या बाद में, एक पक्ष द्वारा दूसरे को दी जाए या देने का वादा किया जाए।

  • धारा 3: दहेज देना, लेना या उसके लेन-देन में सहायता करना अपराध है।
  • धारा 4: दहेज की मांग करना, चाहे शादी से पहले हो या बाद में, अलग अपराध है।
  • विवाह के समय बिना मांग के दिए गए ऐसे उपहारों पर, जिनकी सूची नियमों के अनुसार रखी गई हो, धारा 3 लागू नहीं होती।
  • विवाह के संबंध में किसी और को मिला दहेज कानूनन महिला के लाभ के लिए है और उसे सौंपा जाना चाहिए।

शिकायत कौन और कहाँ कर सकता है?

  • पीड़ित महिला स्वयं, या उसके माता-पिता, भाई-बहन या खून, विवाह अथवा गोद लेने से बने अन्य संबंधी पुलिस को सूचना दे सकते हैं।
  • BNSS की धारा 173 के तहत किसी भी थाने में ‘जीरो FIR’ दर्ज हो सकती है, जिसे बाद में संबंधित थाने को भेजा जाता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने रुपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) में माना कि क्रूरता के कारण ससुराल छोड़ने के बाद महिला जहाँ आश्रय लेती है, जैसे मायके में, वहाँ की अदालत भी परिस्थितियों के अनुसार मामला सुन सकती है।
  • पुलिस के अलावा, मजिस्ट्रेट के समक्ष सीधे परिवाद (Complaint) भी दायर किया जा सकता है।
  • तत्काल खतरे की स्थिति में आपात नंबर 112 और महिला हेल्पलाइन 181 पर संपर्क किया जा सकता है।

शिकायत में घटनाओं की तारीख, स्थान और हर आरोपी की भूमिका स्पष्ट लिखना उसे मजबूत बनाता है।

गिरफ्तारी से जुड़े सुरक्षा उपाय

अर्नेश कुमार फैसला और BNSS धारा 35

सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में कहा कि धारा 498A जैसे अपराधों में, जिनमें सजा सात वर्ष तक है, गिरफ्तारी स्वतः नहीं होनी चाहिए। पुलिस अधिकारी को पहले संतुष्ट होना होगा कि गिरफ्तारी वास्तव में आवश्यक है और इसके कारण लिखित में दर्ज करने होंगे; मजिस्ट्रेट हिरासत की अनुमति देने से पहले इन कारणों की जांच करते हैं।

यही सिद्धांत अब BNSS की धारा 35 (पहले CrPC की धारा 41 और 41A) में है। जहाँ गिरफ्तारी आवश्यक न हो, वहाँ पुलिस उपस्थिति का नोटिस देती है। नोटिस का पालन करने और जांच में सहयोग करने वाले व्यक्ति को सामान्यतः गिरफ्तार नहीं किया जाता, जब तक पुलिस दर्ज कारणों से गिरफ्तारी को जरूरी न माने। निर्देशों की अनदेखी पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय और अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

जुलाई 2025 का फैसला और दो महीने का कूलिंग पीरियड

22 जुलाई 2025 को शिवांगी बंसल बनाम साहिब बंसल (2025 INSC 883) में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2022 के दिशानिर्देशों (मुकेश बंसल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का समर्थन किया और उन्हें लागू करने को कहा। इनके मुख्य बिंदु ये हैं:

  • FIR या शिकायत दर्ज होने के बाद दो महीने का ‘कूलिंग पीरियड’ रहता है, जिसमें नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी या उनके विरुद्ध कोई दंडात्मक (Coercive) कार्रवाई नहीं होती।
  • इस दौरान मामला जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अंतर्गत बनी परिवार कल्याण समिति (Family Welfare Committee) को भेजा जाता है, जो दोनों पक्षों से बात करके विवाद सुलझाने की संभावना देखती है।
  • जिन मामलों में महिला को चोट पहुँची हो, या दस वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराध की धाराएँ जुड़ी हों, वे इस व्यवस्था से बाहर हैं।
  • कूलिंग पीरियड FIR को रद्द नहीं करता। समझौता न होने पर पुलिस कानून के अनुसार जांच आगे बढ़ाती है।

इन निर्देशों का उद्देश्य शिकायत का रास्ता बंद करना नहीं, बल्कि परिवार टूटने से पहले बातचीत का अवसर देना है। जिले में समिति की स्थिति जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से पता की जा सकती है।

शिकायत करने वाली महिला के अन्य अधिकार

आपराधिक मामले के साथ, या उसके बिना भी, पीड़ित महिला घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकती है, जिसमें ये राहतें मिल सकती हैं:

  • संरक्षण आदेश (धारा 18): हिंसा, धमकी या परेशान करने पर रोक।
  • निवास आदेश (धारा 19): साझा घर (Shared Household) में रहने के अधिकार की रक्षा।
  • आर्थिक राहत (धारा 20): खर्च, नुकसान और भरण-पोषण।
  • बच्चों की अस्थायी कस्टडी (धारा 21), मुआवजा (धारा 22), और जरूरत होने पर अंतरिम या एकपक्षीय आदेश (धारा 23)।

संरक्षण आदेश का उल्लंघन अपने आप में अपराध है। BNSS की धारा 144 (पहले CrPC की धारा 125) के तहत जो पत्नी अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, वह पति से मासिक भरण-पोषण मांग सकती है, और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत वैवाहिक मुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषण भी मांगा जा सकता है। महिला अपने स्त्रीधन की मालिक है और उसे वापस पाने की हकदार है। इन विषयों पर पारिवारिक मामलों में हमारी प्रैक्टिस पृष्ठ पर और जानकारी है।

आरोपी पक्ष के अधिकार और अदालतों की सावधानी

कानून उस पक्ष के अधिकारों की भी रक्षा करता है जिस पर आरोप लगे हैं। आरोपी व्यक्ति BNSS की धारा 482 के तहत सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) मांग सकता है। यदि FIR में लिखे आरोप सच मान लेने पर भी अपराध न बनता हो, तो BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट से कार्यवाही रद्द (Quashing) करने का अनुरोध किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि पति के रिश्तेदारों, विशेषकर अलग रहने वाले परिजनों, को सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर मुकदमे में शामिल करना उचित नहीं है। साथ ही अदालतें यह भी मानती हैं कि दहेज उत्पीड़न एक वास्तविक सामाजिक समस्या है, इसलिए हर मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और सबूतों पर होता है। आरोपी पक्ष के विकल्प 498A के आरोपों में कानूनी अधिकार और उपाय और अग्रिम जमानत की पूरी प्रक्रिया वाले लेखों में विस्तार से बताए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या धारा 498A अब भी लागू है?

1 जुलाई 2024 से IPC की जगह BNS लागू है, इसलिए उस तारीख के बाद की घटनाओं पर BNS की धारा 85 और 86 लागू होती हैं। उससे पहले हुई घटनाओं पर IPC की धारा 498A ही लागू रहती है, और उस दिन लंबित कार्यवाही पुरानी CrPC के तहत चलती रहती है। बोलचाल में लोग आज भी इसे ‘498A’ ही कहते हैं।

क्या 498A (BNS 85) का मामला जमानती है?

नहीं, यह गैर-जमानती अपराध है, इसलिए जमानत अधिकार के रूप में नहीं बल्कि अदालत के विवेक से मिलती है। फिर भी तीन वर्ष तक की सजा वाला अपराध होने के कारण गिरफ्तारी स्वतः नहीं होती। पुलिस को BNSS की धारा 35 और अर्नेश कुमार फैसले की शर्तें पूरी करनी होती हैं, और आरोपी व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

क्या केवल दहेज की मांग पर ही यह धारा लगती है?

नहीं। BNS की धारा 86 में क्रूरता के दो रूप हैं। पहला, ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण जो महिला को आत्महत्या की ओर धकेल सकता हो या उसके जीवन या स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पहुँचा सकता हो। दूसरा, संपत्ति या दहेज की अवैध मांग के लिए उत्पीड़न। यानी दहेज की मांग न होने पर भी गंभीर मानसिक या शारीरिक क्रूरता इस धारा में आ सकती है।

कूलिंग पीरियड में क्या शिकायत खत्म हो जाती है?

नहीं। शिवांगी बंसल फैसले (जुलाई 2025) के अनुसार FIR या शिकायत के बाद दो महीने तक नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती और मामला परिवार कल्याण समिति को भेजा जाता है। इससे शिकायत रद्द नहीं होती; समझौता न होने पर जांच आगे बढ़ती है। चोट वाले मामलों और दस वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों पर यह व्यवस्था लागू नहीं होती।

क्या पति के सभी रिश्तेदारों को आरोपी बनाया जा सकता है?

कानून पति और उसके रिश्तेदारों, दोनों पर लागू होता है, पर केवल नाम जोड़ देना पर्याप्त नहीं है। हर आरोपी के विरुद्ध विशिष्ट और ठोस आरोप होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि अलग रहने वाले रिश्तेदारों पर सामान्य और अस्पष्ट आरोप होने पर ऐसी कार्यवाही टिकती नहीं, और हाईकोर्ट BNSS की धारा 528 के तहत उसे रद्द कर सकता है।

घरेलू हिंसा कानून और 498A में क्या अंतर है?

BNS धारा 85 एक आपराधिक प्रावधान है, जिसमें दोष सिद्ध होने पर सजा होती है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 मुख्य रूप से राहत देने वाला कानून है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट संरक्षण, निवास, भरण-पोषण और मुआवजे के आदेश देते हैं। पीड़ित महिला परिस्थिति के अनुसार दोनों रास्ते साथ-साथ अपना सकती है।

संदर्भित कानून और निर्णय

  • Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023, Sections 80, 85 and 86
  • Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, Sections 35, 144, 173 and 531
  • Dowry Prohibition Act, 1961, Sections 2, 3, 4 and 6
  • Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
  • Arnesh Kumar v. State of Bihar (Supreme Court, 2014)
  • Rupali Devi v. State of Uttar Pradesh (Supreme Court, 2019)
  • Shivangi Bansal v. Sahib Bansal, 2025 INSC 883 (Supreme Court, 22 July 2025)

यह लेख 24 सितंबर 2026 तक के कानून की सामान्य जानकारी देता है। यह कानूनी सलाह नहीं है। किसी विशेष मामले में सलाह के लिए किसी अधिवक्ता से संपर्क करें।

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